गजल- आग चूल्ही के अब जराई के:
सभै दढ़ियार बा मोटान बाटै,
आग चूल्ही के अब जराई के।
वदन उघार बा फटही धोती,
लाज धनिया के अब बचाई के।
सभै सामिल बा चापलूसी मा,
खरी बतिया भला सुनाई के।
हेराइ मोर कहूँ गा कजरी चइता
राग भिनसारे वाला गाई के।
हुनर उछिन्न गाँव से होइ गा
बेना मउनी बुनै सिखाई के।
छोटका परिवार बस मेहरी लरिका,
बोझ बप्पा कै अब उठाई के।
बंस कै सान दुलारा बेटवा,
बिना बिटिया के बंस लाई के।
लोक मरजाद दाँव चौसर कै,
इहाँ कान्हा के अब बुलाई के।
निहारैं रात दिन दुआर तर आँखी,
मोहार माई कै जगमगाई के।
गवा परदेस तौ फिर न लउटा
करेज पूत कै या केहू कसाई के।
- अरुण कु तिवारी
सभै दढ़ियार बा मोटान बाटै,
आग चूल्ही के अब जराई के।
वदन उघार बा फटही धोती,
लाज धनिया के अब बचाई के।
सभै सामिल बा चापलूसी मा,
खरी बतिया भला सुनाई के।
हेराइ मोर कहूँ गा कजरी चइता
राग भिनसारे वाला गाई के।
हुनर उछिन्न गाँव से होइ गा
बेना मउनी बुनै सिखाई के।
छोटका परिवार बस मेहरी लरिका,
बोझ बप्पा कै अब उठाई के।
बंस कै सान दुलारा बेटवा,
बिना बिटिया के बंस लाई के।
लोक मरजाद दाँव चौसर कै,
इहाँ कान्हा के अब बुलाई के।
निहारैं रात दिन दुआर तर आँखी,
मोहार माई कै जगमगाई के।
गवा परदेस तौ फिर न लउटा
करेज पूत कै या केहू कसाई के।
- अरुण कु तिवारी

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